ठंड में जिंदगी – लहसून का सूप पीते हैं, नल खुले छोड़ देते हैं; दुनिया के सबसे ठंडे इलाकों में इसी तरह रहते हैं लोग

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ठंड में जिंदगी - लहसून का सूप पीते हैं, नल खुले छोड़ देते हैं; दुनिया के सबसे ठंडे इलाकों में इसी तरह रहते हैं लोग
ठंड में जिंदगी - लहसून का सूप पीते हैं, नल खुले छोड़ देते हैं; दुनिया के सबसे ठंडे इलाकों में इसी तरह रहते हैं लोग
  • दुनिया के सबसे ठंडे गांव ओइमाकॉन में लोग घोड़े का मांस और जंगली बेरी खाते हैं
  • कश्मीर-लद्दाख के लोग एक तरह का हलवा हरीसा खाते हैं
  • अमेरिका में पानी को जमने से बचाने के लिए नल खुले छोड़े जाते हैं

लाइफस्टाइल डेस्क. बफीर्ली हवाओं के कारण अमेरिका का शिकागो पोलर वर्टेक्स की चपेट में है। तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा चुका है। ट्रांसपोर्ट, स्कूल और व्यवसाय ठप्प हैं। पूरे अमेरिका में 29 लोगों की मौत हो चुकी है। शिकागो की ही तरह दुनिया में जगहें ऐसी हैं, जहां सर्दियों में तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है। इनमें रूस के ओइमाकॉन से लेकर लद्दाख और कश्मीर जैसे इलाके शामिल हैं। ऐसे में हमने जाना कि दुनिया की पांच सबसे बफीर्ली जगहों पर कैसे रहते और जीते हैं लोग।

पांच सबसे ठंडी जगह और वहां का रहन-सहन

  1. ओइमाकॉन: दुनिया का सबसे ठंडा गांव, लेकिन यहां पानी नहीं जमता

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    • दुनिया का सबसे ठंडा गांव ओइमाकॉन कड़ाके की सर्दी के लिए जाता है। यहां तापमान अक्सर -50 डिग्री से नीचे जाता है। रूस के साइबेरिया में बर्फ की घाटी में बसे 500 लोगों की आबादी वाले ओइमाकॉन में रहना बेहद मुश्किलों भरा है।
    • यहां कभी पानी नहीं जमता। सालभर 5 हजार फीट तक की गहराई तक बर्फ होने के कारण पानी स्तर पर रहता है। ओइमाकॉन गांव में गाड़ी चलाने से पहले उसे ऐसे गैरेज में रखना पड़ता है, जहां हीटर लगा हो।
    • यहां के लोगों के खाने का मुख्य हिस्सा मछली, घोड़े का मांस और डेयरी प्रोडक्ट है। फलों की खेती या पेड़ न होने के कारण यहां के लोग जंगली बेरी को खाते हैं। ठंड के कारण मछलियों को पकड़ने के बाद मछुआरों को उसे फ्रीज करने की जरूरत नहीं पड़ती।
  2. लद्दाख: सर्दी से छह माह पहले शुरू हो जाती है खाना स्टोर करने की तैयारी

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    • कड़ाके की सर्दी में लद्दाख करीब 6 माह तक दुनिया से कटा रहता है। नवंबर से पहले खाने-पीने और जरूरत का सामान कश्मीर से आता है। इसकी तैयारी कई महीनों पहले से शुरू हो जाती है।
    • खानपान की वैरायटी काफी सीमित होने के कारण गेहूं, जौ, मकई से बने व्यंजन, बकरी और भेड़ का मांस डाइट का हिस्सा रहता है। इसके अलावा थुकपा, चैंग, बटर टी और स्क्यू यहां का देसी फूड है। सर्दी में शरीर का तापमान और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए लहसून का सूप पीते हैं।
    • महिला और पुरुष दोनों ही सर्दियों में वुलन ओवरकोटनुमा ड्रेस पहनते हैं, जिसे गउचा कहते हैं। हवा से बचाव के लिए कमर पर रंगबिरंगे वुलन कपड़े को कसकर बांधते हैं जिसे स्केरग कहते हैं। सिर पर वुलन कैप के साथ याक के बालों, ऊन और लेदर से तैयार जूते पहनते हैं।
  3. अमेरिका: पानी न जमे इसलिए खुला छोड़ देते हैं नल

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    • सर्दी से बचने के लिए अमेरिकी बेहद दिलचस्प तरीके अपनाते हैं। जैसे पानी के पाइप को फ्रीज होने से बचाने के लिए नल को थोड़ा-सा खुला छोड़ देते हैं। इससे वे फ्रीज होकर फटने से बचे रहते हैं।
    • अमेरिकन लो-वोल्टेज और कार्बन फायबर से तैयार इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट का इस्तेमाल करते हैं जो बिस्तर को गर्म रखता है।
    • ज्यादातर घर लकड़ी के बनाए जाते हैं, जिस कारण वे ज्यादा ठंडे या गर्म नहीं होते।
    • नेटिव अमेरिकन ठंड के दिनों में लंबे और बड़े घरों में रहते थे। इन घरों में कबीले के सभी लोग साथ जमा हो जाते थे। ज्यादा लोगों के होने के कारण शरीर की गर्मी से घर का तापमान बढ़ जाता था।
    • नेटिव अमेरिकन लोग तापमान 0 से कम जाने पर लकड़ी काटते थे। इससे शरीर में गर्मी बनी रहती थी। कम तापमान पर लकड़ी आसानी से कट जाती है, जिसे जलाने के लिए भी काम में लिया जाता था।
  4. कश्मीर: शरीर गर्म रखने के लिए सुबह के नाश्ते में लेते हैं हरीसा

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    • यहां 21 दिसंबर से अगले 40 दिन तक पड़ने वाली कड़ाके की सर्दी को चिल्लई कलां कहते हैं। इसके बाद के 20 दिनों को चिल्लई खुर्द का नाम दिया गया है। ये दिन हाड़ कंपाने देने वाली सर्दी के लिए जाने जाते हैं। तापमान -5 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है।
    • इस मौसम में ज्यादातर लोग सुबह के नाश्ते में हरीसा खाते हैं। यह तरह का हलवा कहा जा सकता है, जिसे रातभर पकाया जाता है। इसे बकरी या भेड़ का मांस, चावल और मसालों से तैयार किया जाता है। इसे कश्मीरी ब्रेड के साथ खाते हैं।
    • खानपान में ऐसी चीजें शामिल करते हैं जो शरीर गर्म रखने और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती हैं। इसमें ड्राई फ्रूट, मांसाहार, हर्बल टी और मसाला टी शामिल हैं।
    • ठंड से बचने के लिए कांगड़ी का खूब इस्तेमाल होता रहा है। यह मिट्टी का बर्तन है जिसमें कोयला डाल लिया जाता है। उसके बाद लोग उसे अपने चोगे के अंदर रखकर घूमते हैं और अपने सभी काम करते हैं।
    • ज्यादातर जगहों पर लो वोल्टेज के कारण रूम हीटर बहुत अधिक काम नहीं करते। लकड़ियों को जलाकर घर का तापमान बढ़ाने की कोशिश की जाती है। ज्यादातर घर लकड़ी के बनाए जाते हैं जो गर्मी में न तो बहुत अधिक गर्म होते हैं, न सर्दियों में अधिक ठंडे।
  5. टोक्यो : टेबल हीटर के नीचे करते हैं आराम

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    • सर्दियों के दिनों में ज्यादातर घरों में कोटैट्सू हीटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक छोटे आकार की टेबल होती है, जो गर्माहट के स्रोत के ऊपर रखी होती है। इस पर कंबल डालते हैं और टेबल के नीचे पैर रखकर आराम करते हैं। यह आसपास बैठे लोगों को भी गर्माहट देता है।
    • तापमान कम होने पर पहले चारकोल जलाया जाता था, लेकिन इसकी जगह अब इलेक्ट्रिक ब्लैंकेट ने ले ली है।
    • खानपान से जुड़ी ज्यादातर चीजें गर्म तासीर वाली होती हैं। इसमें यूडोफू और अगेदाशीडोफू खासतौर पर शामिल है।
    • यूडोफू सूप होता है जो टोफू के छोटे टुकड़ों को पोंजु सॉस में डुबोकर बनाया जाता है। अगेदाशीडोफू को भी टोफू से बनाया जाता है।
    • पफर फिश से बनी फुगु डिश और नाबे के अलावा प्रोटीन से भरपूर सब्जियां और ओडेन को (सब्जियां, मीट, सोय सॉस और दशी के शोरबे में पकाकर) खाया जाता है।

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